Saturday, April 18, 2026

उत्तर-पूर्व भारत के 200 से अधिक विशेषज्ञ डॉक्टर काजीरंगा में जुटे, क्रिटिकल केयर और ऑर्गन ट्रांसप्लांट पर मिला ताजा अपडेट

  • उत्तर-पूर्व में ऑर्गन ट्रांसप्लांट की बाधाओं; किडनी, लिवर, फेफड़ा और हृदय ट्रांसप्लांट प्रबंधन, दाता अंगों की भारी कमी, परिवहन की लॉजिस्टिक कठिनाइयाँ, अपर्याप्त इंफ्रास्ट्रक्चर और विशेष पोस्ट-ऑपरेटिव केयर की कमी जैसे मुद्दों पर हुई विस्तृत चर्चा 

गुवाहाटी। उत्तर-पूर्व भारत में क्रिटिकल केयर और ऑर्गन ट्रांसप्लांट सेवाओं को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए यशोदा हॉस्पिटल्स ने इंडियन सोसाइटी ऑफ क्रिटिकल केयर मेडिसिन (ISCCM) गुवाहाटी शाखा के सहयोग से काजीरंगा के बोरगोस द वाइल्ड हेवन में दो दिवसीय “क्रिटिकल केयर अपडेट 2025 नॉर्थ ईस्ट” का सफल आयोजन किया।

इस सम्मेलन में असम, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड, सिक्किम और त्रिपुरा; इन आठ उत्तर-पूर्वी राज्यों के 200 से अधिक विशेषज्ञ डॉक्टर एकत्र हुए और क्रिटिकल केयर मेडिसिन में नवीनतम प्रगति तथा क्षेत्र में ऑर्गन ट्रांसप्लांट की अनूठी चुनौतियों पर चर्चा की। यशोदा ग्रुप ऑफ हॉस्पिटल्स के निदेशक डॉ. पवन गोरुगंती (MD, AB क्रिटिकल केयर एंड पल्मोनोलॉजी) ने कार्यक्रम में शिरकत की और यशोदा हॉस्पिटल्स तथा उत्तर-पूर्वी राज्यों के बीच उन्नत चिकित्सा सेवाओं (ECMO और सॉलिड ऑर्गन ट्रांसप्लांट सहित) में सहयोग पर जोर दिया।

उन्होंने विशेषज्ञों को वास्तविक केस स्टडीज के माध्यम से ज्ञान-विनिमय के लिए यशोदा हॉस्पिटल्स आने का न्योता दिया। सम्मेलन के आयोजक थे; यशोदा हॉस्पिटल्स के क्रिटिकल केयर मेडिसिन विभाग के क्लिनिकल डायरेक्टर डॉ. वेंकट रमण कोला, ISCCM गुवाहाटी सिटी ब्रांच के चेयरपर्सन डॉ. राकेश पेरिवाल तथा सम्मेलन कोऑर्डिनेटर डॉ. ऋषु गुप्ता खानिकर (गुवाहाटी)। डॉ. वेंकट रमण कोला ने कहा कि पिछले दशक में उत्तर-पूर्व में क्रिटिकल केयर सुविधाओं का तेजी से विकास हुआ है और जटिल ऑर्गन ट्रांसप्लांट की सफलता विशेषज्ञों के बीच सहयोग व ज्ञान-साझेदारी पर निर्भर करती है।

डॉ. राकेश पेरिवाल ने कहा, “यह सम्मेलन न केवल ज्ञान के आदान-प्रदान का माध्यम बना, बल्कि क्षेत्रीय डॉक्टरों को अपनी चुनौतियाँ साझा करने और व्यावहारिक समाधान तलाशने का साझा मंच भी प्रदान किया।” मुख्य सत्रों में उत्तर-पूर्व में ऑर्गन ट्रांसप्लांट की बाधाओं; किडनी, लिवर, फेफड़ा और हृदय ट्रांसप्लांट प्रबंधन, दाता अंगों की भारी कमी, परिवहन की लॉजिस्टिक कठिनाइयाँ, अपर्याप्त इंफ्रास्ट्रक्चर और विशेष पोस्ट-ऑपरेटिव केयर की कमी जैसे मुद्दों पर विस्तृत चर्चा हुई। भारत में हर साल लगभग 5 लाख लोग अंग विफलता का शिकार होते हैं, लेकिन केवल 3-5 प्रतिशत  को ही ट्रांसप्लांट मिल पाता है।

भौगोलिक अलगाव और विशेष केंद्रों की सीमित संख्या के कारण उत्तर-पूर्व में स्थिति और भी गंभीर है। विशेषज्ञों ने रोबोटिक सर्जरी, व्यक्तिगत इम्यूनोसप्रेसेंट दवाएँ और लंबे फॉलो-अप के लिए टेलीमेडिसिन जैसी अत्याधुनिक तकनीकों को अपनाने पर जोर दिया। असम में सफल डिसीज्ड-डोनर लिवर ट्रांसप्लांट के वास्तविक केस स्टडीज भी साझा किए गए, जिसने क्षेत्र के लिए नई उम्मीद जगाई। उत्तर-पूर्व भारत के स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए इस सम्मेलन को एक मील का पत्थर माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे नियमित आयोजन ज्ञान-विनिमय को बढ़ाकर क्षेत्र की स्वास्थ्य सेवाओं के स्तर को ऊँचा उठाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।

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