- रेल सेवा बंद होने की वजह असहाय होकर स्टेशन पर दिन काट रहे थे
बदरपुर – लामडिंग हिल सेक्शन में रेल सेवा बंद होने से एक ओर जहां यात्रियों की समस्या बढ़ गई है, तो वहीं दूसरी तरफ विभिन्न स्टेशनों पर प्रवासी मज़दूर सह यात्री फंसे हुए हैं। इस क्रम में सिलचर रेलवे स्टेशन पर आधे दर्जन प्रवासी मज़दूर फंसे हुए थे, जिन्हे असम प्रदेश युवा यादव महासभा की मदद से गुवाहाटी भेजा गया। सभी मज़दूर बिहार के सहरसा से है। वे तीन दिन से फंसे हुए थे और रेल सेवा बंद होने की वजह असहाय होकर स्टेशन पर दिन काट रहे थे।
जेब जितने रुपए थे, खाने – पीने पर खर्च हो गए। चंद रुपए बचे हुए हैं। उनका कहना था कि दो दिन और रुकना पड़ता तो भूखे मरने की नौबत आ जाती। उक्त संवाददाता के साथ बातचीत में कामेश्वर यादव ने बताया कि वे छह लोग है और तीन दिन से सिलचर रेलवे स्टेशन पर इस आस के साथ दिन बिता रहे शायद कोई रेल चल पड़े और वह अपने राज्य लौट जाए। उन्होंने कहा कि वे सभी सात महीने पहले पहली बार पूर्वोत्तर भारत में आए।
मणिपुर और नागालैंड में गणपति नामक सड़क निर्माण कम्पनी में मज़दूर के रूप में काम करने आए है। कंपनी अब उन्हें वापस भेज रही। तीन दिन पूर्व जब मणिपुर के जिरीबाम होते हुए दुर्गम पहाड़ी का रास्ता तय कर सिलचर स्टेशन पहुंचे, तो पता चला बदरपुर – लामडिंग के बीच जटिंगा लामपुर में भूस्खलन की वजह से रेल सेवा बाधित है। उन्होंने सोचा है कि एक दिन काट लेते है, शायद अगले दिन सब ठीक हो जाए। अब तीन दिन बीत गए। चौथी रात काट लेंगे लेकिन रेल कब चालू होगा यह स्पष्ट नहीं हो पा रहा।
कामेश्वर यादव के साथ गौरव कुमार यादव, कमल किशोर यादव, रुपेश यादव, राकेश कुमार यादव और श्रीनेश यादव है। कंपनी द्वारा मिले रुपए ख़त्म होने को है। इनलोगों ने बताया कि उनके जीवन में पहली बार ऐसा हुआ है। बहुत बुरा अनुभव बताते हुए दोबारा पूर्वोत्तर भारत में न आने की बात कही। इन लोगों दुःख है कि कोई मदद के लिए सामने नहीं आया है। रेलवे की तरफ से भी कोई मदद के लिए आगे नहीं आया है। पानी की बोतल तक देने वाला नहीं दिखाई दिया। कामेश्वर ने कहा कि वे मज़दूर है और इतने रुपए नहीं है कि सड़क के माध्यम से गुवाहाटी चले जाते।
उन्होंने बताया कि वे दिन में दो-तीन बार स्टेशन पर रेलवे विभाग के अधिकारियों के पास जाकर पूछ रहे हैं कि लाइन कब खुलेगी, लेकिन उन्हें कोई सकारात्मक जवाब नहीं मिला है। अधिकारी हर बार कोई गारंटी न होने की बात कहकर उन्हें टरका दे रहे हैं। इस तरह जैसे-जैसे समय बीतता जा रहा, उनकी चिंता बढ़ती जा रही है। काम से जो पैसे मिले हैं, उनमें से अधिकांश मणिपुर से घर भेजे हैं। घर लौटने के लिए उनके पास थोड़े पैसे थे।
सिलचर में फंसे होने के कारण वे पैसे भी रोजमर्रा के खर्च चलाने के लिए खत्म होने वाले हैं। वे सोच भी नहीं सकते कि अगर कुछ दिन और ऐसे ही गुजारे तो क्या होगा। कामेश्वर एवं उनके अन्य साथियों ने बताया कि वे लंबे समय से सड़क निर्माण कार्य से जुड़े हैं। हालांकि, वे पहली बार इस क्षेत्र में आए हैं। उन्होंने पहली बार नार्थ ईस्ट में आने पर हुए ऐसे अनुभव के बारे में बताया और कहा कि वे यहां दोबारा नहीं आएंगे। ऐसा निर्णय लेने का कारण बताते हुए उन्होंने कहा कि वे काम के सिलसिले में उत्तर से लेकर दक्षिण भारत तक कई जगहों पर गए हैं।
कुछ साल पहले आपदा के दौरान वे उत्तराखंड में थे। लेकिन वे आपदाएं बहुत बड़े पैमाने की आपदाएं और समस्याएं हो सकती हैं। झेले भी है। लेकिन नार्थ ईस्ट में, तो देख ही रहे हैं कि बारिश होते ही सड़कें से लेकर रेल लाइन तक सब बंद हो जाती हैं। तो अपनी दुर्दशा में भी उन्हें आश्चर्य हो रहा है कि इस इलाके के लोग सालों से कैसे रह रहे हैं।
फिलहाल इस बीच पूर्वोत्तर हलचल ने भोला यादव से फोन पर संपर्क किया। युवा यादव महासभा के प्रदेश अध्यक्ष भोला यादव ने शाम को जानकारी दी कि सभी प्रवासी मज़दूरों को गुवाहाटी बस में बैठाकर भेज दिया गया है। आवश्यक मदद का पूरा भरोसा दिया गया है। मानवीय दृष्टि से उनका फर्ज बनता है, उनकी मदद की जाए और समाचार मिलते ही सहयोग किया गया।
योगेश दुबे


