Sunday, September 6, 2026

प्रो. सुशील कुमार शर्मा को मिला भारत–श्रीलंका हिंदी गौरव सम्मान 

  • प्रो. शर्मा को यह सम्मान वैश्विक हिंदी सेवा, भाषा–साहित्य, अनुवाद तथा भारतीय संस्कृति के प्रति उत्कृष्ट लेखन तथा अकादमिक साधना हेतु प्रदान किया गया है।

पूर्वोत्तर हिंदी अकादमी, शिलांग द्वारा आयोजित 20वें लेखक मिलन शिविर में (9 से 13 जनवरी, 2026) विश्व हिंदी दिवस के अवसर पर स्वामी विवेकानंद सांस्कृतिक केंद्र, भारतीय उच्चायोग, कोलंबो (श्रीलंका) में मिज़ोरम केंद्रीय विश्वविद्यालय, आईजोल के हिंदी विभाग के सीनियर प्रोफेसर एवं मध्यकालीन हिंदी साहित्य के मर्मज्ञ प्रो. सुशील कुमार शर्मा को भारत–श्रीलंका हिंदी गौरव सम्मान से विभूषित किया गया।

प्रो. शर्मा को यह सम्मान वैश्विक हिंदी सेवा, भाषा–साहित्य, अनुवाद तथा भारतीय संस्कृति के प्रति उत्कृष्ट लेखन तथा अकादमिक साधना हेतु प्रदान किया गया है। प्रो. शर्मा का यह सम्मान न केवल व्यक्तिगत साधना की स्वीकृति है, बल्कि हिंदी भाषा-साहित्य और अनुवाद परंपरा की उस सृजनात्मक दृष्टि का भी सम्मान है, जो भाषा को संस्कृति, ज्ञान और मानवीय संवाद का सेतु मानती है।

वरिष्ठ शिक्षाविद, साहित्यकार और समीक्षक प्रो. सुशील कुमार शर्मा का नाम हिंदी अकादमिक परिदृश्य में सम्मान और स्वीकार्यता के साथ लिया जाता है। दिल्ली विश्वविद्यालय से एम.ए., एम.फिल. और पी-एच.डी. जैसी सुदृढ़ शैक्षिक उपलब्धियों के साथ उन्होंने हिंदी साहित्य के गहन अध्ययन और व्याख्या को नई दृष्टि दी। तीन दशकों से अधिक के शिक्षण एवं शोध-अनुभव ने उन्हें एक परिपक्व, दूरदर्शी और प्रभावशाली शिक्षाविद के रूप में प्रतिष्ठित किया है।

प्रो. शर्मा की अनुवाद-दृष्टि उनकी सबसे बड़ी पहचान है। वे अनुवाद को मात्र भाषांतरण नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पुनर्सृजन की प्रक्रिया मानते हैं। उनके लेखन में स्रोत-पाठ की अर्थ-निष्ठा के साथ लक्ष्य-भाषा की संवेदना, सौंदर्य और सामाजिक संदर्भों का संतुलन दिखाई देता है। इसी दृष्टि के कारण उनके अनुवाद-संबंधी शोधपत्र और आलोचनात्मक आलेख विश्वविद्यालयों और शोध-संस्थानों में मानक संदर्भ के रूप में उद्धृत होते हैं।

प्रकाशन और शोध के स्तर पर उनका अवदान अत्यंत व्यापक है। उनकी मौलिक पुस्तकों—रामचरितमानस में नारी, मधुमालती में प्रेम-व्यंजना, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना: दृष्टि और सृष्टि, साहित्य विमर्श का विवेक तथा चिंतन के विविध आयाम—ने हिंदी आलोचना, काव्य-मीमांसा और विमर्श को समृद्ध किया है।

इसके अतिरिक्त दो संपादित ग्रंथ, दर्जनों शोधपत्र, पुस्तक-अध्याय, पाठ्य-सामग्री और समीक्षाएँ उनके बहुआयामी लेखन का प्रमाण हैं। उन्होंने सौ से अधिक राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठियों में शोधपत्र प्रस्तुत किए, अनेक सत्रों की अध्यक्षता की और आमंत्रित व्याख्यानों के माध्यम से अकादमिक संवाद को सुदृढ़ किया।

मार्गदर्शन और अकादमिक नेतृत्व प्रो. शर्मा के कार्य का सशक्त आयाम है। एम.फिल. और पी-एच.डी. स्तर पर उनके निर्देशन में अनेक शोधार्थियों ने शोध उपाधियाँ प्राप्त कीं; शोध-परियोजनाएँ पूर्ण हुईं और अनुसंधान-संस्कृति को गति मिली। वे मिज़ोरम केंद्रीय विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के संस्थापक विभागाध्यक्ष तथा शिक्षा एवं मानविकी संकाय के पूर्व संकायाध्यक्ष रहे—जहाँ उनके प्रशासनिक निर्णयों ने पाठ्यक्रम-नवाचार, शोध-मानकों और संस्थागत समन्वय को नई दिशा दी।

नैक सहकर्मी दलों में सहभागिता तथा राजभाषा कार्यान्वयन समितियों में दायित्व उनके राष्ट्रीय स्तर के योगदान को रेखांकित करते हैं।

भारत में हिंदी का संवाहक के रूप में उनकी भूमिका विशेष उल्लेखनीय है। भारत के बहुभाषिक समाज में उन्होंने हिंदी को प्रतिस्पर्धी नहीं, बल्कि सहचर भाषा के रूप में स्थापित किया। पूर्वोत्तर भारत की स्थानीय भाषाओं, लोक-संवेदनाओं और हिंदी के बीच अनुवाद तथा तुलनात्मक अध्ययन के माध्यम से उन्होंने साहित्यिक सौहार्द को बढ़ाया। इससे हिंदी अध्ययन स्थानीय अनुभवों और समकालीन सामाजिक प्रश्नों से जुड़ा और उसकी स्वीकार्यता सुदृढ़ हुई।

अंतरराष्ट्रीय मंच पर हिंदी के लिए उनके प्रयास भी सराहनीय हैं। सिंगापुर, दक्षिण अफ्रीका, मारीशस, फिजी और श्रीलंका में आयोजित अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठियों एवं विश्व हिंदी सम्मेलनों में सक्रिय भागीदारी, व्याख्यान और संवाद ने वैश्विक सांस्कृतिक संबंधों को सुदृढ़ किया। उनकी विद्वत्ता और सृजनात्मकता सीमाओं से परे प्रभाव डालती है।

मीडिया और सार्वजनिक बौद्धिकता के स्तर पर भी उनका प्रभाव व्यापक है। तीन दशकों से अधिक के मीडिया-संपर्क के माध्यम से वे भाषा-नीति, अनुवाद-विमर्श और साहित्यिक प्रश्नों पर सार्थक हस्तक्षेप करते रहे हैं। उनकी डिजिटल अकादमिक उपस्थिति ने हिंदी के वैश्विक विस्तार को भी बल दिया है।

इस गौरवपूर्ण उपलब्धि पर मिज़ोरम केंद्रीय विश्वविद्यालय परिवार और साहित्यिक समुदाय ने प्रो. सुशील कुमार शर्मा को हार्दिक बधाई देते हुए कामना की है कि वे भविष्य में भी हिंदी भाषा, साहित्य और अनुवाद के क्षेत्र में अपनी रचनात्मकता, प्रेरणा और विद्वत्ता से समाज को प्रबुद्ध करते रहें। वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. बी एल गौड़ और सृजन संसार अंतरराष्ट्रीय पत्रिका समूह के वैश्विक समूह संपादक डॉ. शैलेश शुक्ला ने भी प्रो. सुशील कुमार शर्मा को पुरस्कार मिलने पर हार्दिक बधाई दी और शुभकामनाएं व्यक्त कीं।

पूर्वोत्तर हलचल ब्यूरो 

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