- कहा गया, बरसात के मौसम की शुरुआत से ही पहाड़ की रेल लाइन भूस्खलन के कारण बार-बार बंद हो रही, नतीजतन, यात्रियों को अकल्पनीय पीड़ा का करना पड़ रहा है सामना
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चंद्रनाथपुर – लंका द्वितीय रेल मार्ग पर तत्काल काम शुरू करने की मांग तेज हो गई है। सिलचर-लामडिंग ब्रॉडगेज कार्यान्वयन संग्राम समिति ने चंद्रनाथपुर – लंका द्वितीय रेल मार्ग पर तत्काल काम शुरू करने की मांग को लेकर सिलचर रेलवे स्टेशन के समक्ष धरना दिया। समिति का मानना है कि चंद्रनाथपुर – लंका रेल लाइन बिछने से हर साल मानसून के दौरान पहाड़ लाइन पर यात्रियों की भारी परेशानी खत्म होगी।

सिलचर रेलवे स्टेशन के सामने, शनिवार, 12 जुलाई; सुबह 11:30 बजे से आंदोलन आरंभ हुआ। पूसी रेलवे लामडिंग मंडल के अधिकारी को एक ज्ञापन सौंपे गए। सिलचर-लामडिंग ब्रॉडगेज कार्यान्वयन संग्राम समिति के संयोजक प्रोफेसर अजय रॉय ने स्पष्ट किया है कि वे अब इस मुद्दे पर बड़े आंदोलन के संकेत दिया है। कहा गया कि पिछले महीने और इस महीने भी भी हुई भूस्खलन ने अपितु बराक घाटी ही नहीं बल्कि असम से सटे मिजोरम, त्रिपुरा, मणिपुर वासियों के लिए कठिन परिस्थिति पैदा की। तीन बार रेल सेवा बाधित हुआ। गेमन ब्रिज बंद है।
ब्रिज का मरम्मतीकरण चल रहा। वैकल्पिक सिलचर कलाइन मार्ग पर हारंग नदी पर पुल पिछले महीने में टूट गया था। वैली ब्रिज बन रहा है। वहीं बदरपुर लामडिंग हिल सेक्शन में तीन बार भूस्खलन ने रेल सेवा संचालन को बाधित किया। राहत वाली बात है, पुनः रेल सेवा बहाल हुई है। मानसून में भूस्खलन समय होने वाली परेशानी से मुक्ति पाने के लिए के लिए चंद्रनाथपुर – लंका द्वितीय रेल मार्ग पर तत्काल काम शुरू करने के प्रस्ताव को अमलीजामा पहनाया जाना चाहिए । चंद्रनाथपुर कछार जिले में पड़ता है, यहां से वाया लंका होकर एक नई रेल लाइन बिछाई जा सकती है।
इस रूट पर भूस्खलन की संभावना कम है, ऐसा दावा किया जाता है। यह मांग लंबे समय से चल रहा, रेल मंत्रालय भी इस परियोजना को लेकर गंभीर है। उल्लेखनीय है कि सर्वेक्षण रिपोर्ट प्रकाशित न होने के कारण, समिति द्वारा पिछले वर्ष फरवरी में मणिपुर और त्रिपुरा राज्यों के प्रतिनिधियों की उपस्थिति में सिलचर गांधी बाग में आयोजित एक जनसभा में इस मांग को फिर से जोरदार ढंग से उठाया गया। वर्तमान परिस्थिति में इस परियोजना का कार्यान्वयन बराक घाटी के लोगों की एक जन मांग बन गया है।
बराक घाटी के लोगों का कटु अनुभव यह है कि परियोजना की घोषणा के बाद भी, विभिन्न विलंबों के कारण यह कई वर्षों तक अटकी रही। यद्यपि सिलचर-लामडिंग ब्रॉडगेज विस्तार की घोषणा 1996 में की गई थी, परन्तु 2009 में परियोजना का केवल 29 प्रतिशत कार्य ही पूरा हो पाया था, जिसके परिणामस्वरूप बराक घाटी और पड़ोसी राज्यों के लोगों के संघर्ष हेतु 2009 में सिलचर-लामडिंग ब्रॉडगेज कार्यान्वयन आंदोलन समिति का गठन किया गया।
समिति द्वारा 2015 तक 36 सूत्री आंदोलन के दबाव में तत्कालीन केंद्र सरकार को सिलचर लामडिंग ब्रॉड गेज विस्तार कार्य पूरा करने के लिए मजबूर होना पड़ा। विरोध प्रदर्शन के दौरान, प्रमुख सामाजिक कार्यकर्ता और नागरिक अधिकार संरक्षण संग्राम परिषद के महासचिव हरिदास दत्ता ने कहा कि बरसात के मौसम की शुरुआत से ही पहाड़ की रेल लाइन भूस्खलन के कारण बार-बार बंद हो रही है। नतीजतन, यात्रियों को अकल्पनीय पीड़ा का सामना करना पड़ रहा है। रेलवे लाइन अभी तक सामान्य नहीं हुई है।
समिति द्वारा कहा गया कि ऐसा नहीं है कि सिर्फ भूस्खलन के कारण रेलवे लाइन बंद है, बल्कि जब बराक घाटी और त्रिपुरा के रेलवे, मिजोरम और मणिपुर राज्यों की ट्रेनों के साथ, केवल एक रेलवे लाइन से गुजरेंगे, तो उन्हें व्यावहारिक रूप से यातायात की समस्याओं का सामना करना पड़ेगा। यह समस्या रेल यात्रियों के घंटों बर्बाद करेगी। केंद्र सरकार ने 1984 में ही इस परियोजना के बारे में सोचना शुरू कर दिया था। आंदोलन के दौरान पुलिस ने आंदोलनकारियों को हिरासत में लिया और बाद में रिहा कर दिया।


