Tuesday, September 8, 2026

बांग्लादेश से आए नागरिकों को भूमि अधिकार, लेकिन आदिवासियों को नहीं, यह कैसा इंसाफ, ऑल आदिवासी स्टूडेंट्स एसोसिएशन ऑफ असम ने किया सवाल 

एसटी का दर्जा देने और भूमि अधिकार और बराक व ब्रह्मपुत्र घाटी में न्यूनतम मज़दूरी को एक समान करने सहित कई सूत्री मांगो को लेकर हुआ विरोध प्रदर्शन
मुख्यमंत्री डॉ. हिमंत विश्व शर्मा उनके लिए गंभीर नहीं हैं। वह यहाँ के मूल आदिवासी है। उन्हें चाय बागानी बनाकर रख दिया है। उन्हें एसटी के दर्जे से वंचित किया जा रहा है। किसी दिन चाय बागान प्रबंधक खदेड़ देता है तो वे कहां जाएंगे, कहां रहेंगे। जमीन का पट्टा तक नहीं है। 

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ऑल आदिवासी स्टूडेंट्स एसोसिएशन ऑफ असम ( आसा ) ने बड़ा आरोप मढ़ा है। संस्था ने कहा है कि बांग्लादेश से भागकर आए नागरिकों को असम में भूमि अधिकार मिल गया है, लेकिन आदिवासी समुदाय को आज भी उनके अधिकारों से वंचित रखा गया है। आसा ने सोमवार को एससी-एसटी का दर्जा देने और भूमि अधिकार और बराक व ब्रह्मपुत्र घाटी में न्यूनतम मज़दूरी को एक समान करने सहित कई सूत्री मांगो को लेकर यहां सिलचर में जमकर विरोध प्रदर्शन किया।

प्रदर्शन में विभिन्न चाय बागानों से बड़ी संख्या, विशेषकर महिलाओं, में लोग पहुंचे और अपनी आवाज को बुलंद किया। विरोध प्रदर्शन के माध्यम से अपनी मांगों को मज़बूती के साथ रखा है। सिलचर खुदीराम मूर्ति के सामने लगभग दो घंटे तक विरोध प्रदर्शन चला। प्रदर्शन बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह को एक ज्ञापन भेजा गया।

ज्ञापन की एक प्रतिलिपि असम के मुख्यमंत्री डॉ. हिमंत विश्व शर्मा को भी भेजी गई। आसा के सचिव देवोज्योति तांती मीडिया के साथ बातचीत में असम सरकार पर वादाखिलाफी का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि वर्ष 2016 में भाजपा अपने ही किए वादों से मुकर रही है। सत्ता में आने के बाद एसटी का दर्जा देने का वादा किया था, लेकिन अभी तक इस मांग को पूरा नहीं किया गया है। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री डॉ. हिमंत विश्व शर्मा इच्छा प्रकट करें तो, उनकी मांग पूर्ण होने में समय नहीं लगेगा। चूंकि डॉ शर्मा ने कई महत्वपूर्ण विधेयक पारित कराकर यह साबित किया है कि असंभव कुछ भी नहीं है।

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कहा गया वह आदिवासी समुदाय से हैं और उन्हें एससी एसटी का दर्जा दिया जाना चाहिए। उनके समुदाय के लोगों को अन्य कई राज्यों में पहले से ही एसटी का दर्जा मिला है, जो उनके मूल रिश्तेदार और संबंधी है, लेकिन असम में वह आज भी अपनी मांग जो उनका हक है उसको लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं। उनकी अच्छी खासी आबादी है, वे लोग बहुत सीधे-साधे हैं। साल 2016 में असम में भाजपा की सरकार ने वादा किया था कि उन्हें एसटी का दर्जा दिया जाएगा। वे लोग अपनी मेहनत मजदूरी करके अपना जीवन यापन कर रहे हैं।

अभी असम के अंदर आदिवासियों को ओबीसी में रखा गया है और उन्हें उनकी जमीन का पट्टा भी नहीं दिया गया है। उनके लोगों को जल्द से जल्द, आदिवासियों को, जमीन का पट्टा और एससी-एसटी का दर्जा दिए जाना चाहिए।  अगर उनकी मांगे नहीं मानी जाती है तो वह फिर आगे तीव्र प्रदर्शन करेंगे और इसकी जिम्मेदारी असम सरकार की होगी। बांग्लादेश से भागकर आने वालों को भूमि अधिकार दे दिया गया, किन्तु वह भारत के मूल नागरिक है, बावजूद उनकी उपेक्षा हो रही। चाय बागानों में निवास करते हैं।

असम सरकार से संवैधानिक गरिमा प्रदान करने की मांग की। यह आरोप लगाया कि मिशन बशुंधरा के तहत मिलने वाले लाभ से भी वंचित है। आसा नेता ने बताया कि एक बड़ी आबादी उनकी चाय बागानों में रहती है। उनके द्वारा उठाए गए मांग जायज है और उसे पूरा करने के लिए सरकार से आग्रह किया। सरकार के प्रति आदिवासियों का विश्वास कायम रहे, लिहाज़ा सभी आदिवासी समुदायों को अनुसूचित जनजाति (एसटी) और अनुसूचित जाति (एससी) का दर्जा देने की मांग की।

तांती ने कहा कि मुख्यमंत्री डॉ. शर्मा इच्छा शक्ति बना ले तो सब संभव है। ब्रह्मपुत्र और बराक घाटी के चाय बागानों में श्रमिकों को मिलने वाले तय मज़दूरी में बड़ा अंतर है। आसा ने यह मांग की कि ब्रह्मपुत्र और बराक घाटी में सरकार द्वारा न्यूनतम मज़दूरी को एक समान कर दिया जाना चाहिए। ब्रह्मपुत्र वैली की तुलना में बराक घाटी के चाय बागानों में मज़दूरी कम मिल रहा। श्रमिकों के साथ अन्याय नहीं किया जाना चाहिए। दोनों वैली में समान मज़दूरी हो यह कोशिश होनी चाहिए।

Yogesh Dubey 

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